चन्दौसी का चित्रकार
- vision5design

- Oct 4, 2021
- 6 min read
Updated: Oct 7, 2021
सीता रोड, चन्दौसी के अवलेश कुमार वार्ष्णेय अपने वास्तविक नाम से कम पर सबरंग के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं।

आपने सीता आश्रम की ओर आते- जाते कभी न कभी सबरंग चित्रालय पर एक नज़र जरूर डाली होगी।

सीता रोड के आरम्भ में मनिहार या चूडी चौक (यहाँ कभी चूड़ियो की दुकाने हुआ करती थीं) से जब आप फूल गली की ओर बढ़ते हैं तब इस साधारण से रिहाइशी क्षेत्र में र॔ग बिरंगी दुकान ही सबरंग चित्रालय है।

अब तो एक से दो दुकानें कर ली हैं। घर से जुड़ा हुआ स्टूडियो है और सड़क के पार पेंटिग्स गिफ्ट की एक शाॅप भी है।
जी हाँ, आज हम आपको चन्दौसी के इन्हीं चित्रकार से रूबरू करवाते हैं।
इन दिनों आप किस विषय पर कार्य कर रहे हैं?
विभिन्न पोट्रेट आर्डर के अलावा राम बाग स्थित हनुमान मंदिर में कलात्मक सज्जा और श्रंगार का काम चल रहा है।

ओमी लाला जी के परिवार द्वारा हर वर्ष नवरात्र से पूर्व यह कार्य संचालित होता है।

इस मंदिर में हैण्ड पेंटिड म्यूरल यानि कि दीवारों पर हनुमान व रामचंद्र जी की कथाओं के दृश्य चित्रित हैं।
बहुत बढ़िया! अब कुछ अपनी पारिवारिक पृष्टभूमि और बाल्यकाल के बारे में बतायें साथ ही यह भी बतायें कि चित्रकारिता के क्षेत्र में किस प्रकार आये।
हमारे परिवार में अनाज आढ़त का काम होता था और परिवार के कुछ सदस्य अभी भी इसी व्यापार से जुड़े हैं पर कला या चित्रकला से दूर-दूर तक कोई संपर्क नहीं।
हमारा परिवार बड़ा था इस लिए नित नये नये व्यवसायिक प्रयोग होते रहते थे। क्योंकि आढ़त का काम फसल सीजन पर आधारित होता है इस लिए आढ़त के अलावा टिन पीपा, राव- सीरा यहाँ तक की ढाबा-होटेल का काम भी कभी न कभी हमारे परिजनों ने आज़माया है और यह कहानी उस समय के चन्दौसी के अधिकतर सामान्य व्यापारी की रही है।
वास्तव मे कहा जाये तो चन्दौसी में सब एक सा व्यापार करने लगते हैं। एक बहार मैंथा ऑयल की भी आई थी जिसे देखो वो इसी धन्धे से जुड़ा था।
खैर, मतलब यही है की परिवार की पृष्ठभूमि एक सामान्य चन्दौसी के व्यापारी परिवार की रही है।
बचपन में खूब खेले खाये हैं, आढत पर मूंगफली गुड गन्ने जो मिला ज़मके खाया। उस समय UKG या KG स्कूल नही होते थे। बच्चों को 5 -6 साल फ्री होके खेलने को मिलता था। बाद में सरकारी नगरपालिका के स्कूल भेज दिया जाता था जहाँ टप्पर पर बैठकर तख्ती और चाॅक से अ आ इ ई और पहाड़े सीखने पड़ते थे जमकर पिटाई भी हुआ करती थी।
तो, इसी तख्ती की वज़ह से कलमकट लेखन का हुनर हाथ में आ गया। पढ़ाई में दिल लगा नहीं और इन्हीं दिनो कॉमिक्स का दौर आ गया तो गर्मियों की छुट्टियों में कॉमिक्स पढ़ना और कॉमिक्स के सेट लाकर छोटी सी दुकान लगाकर मुहल्ले के बच्चों को किराये पर पढ़ाना, यह सब खूब किया है। मैं कॉमिक्स के चित्र और फिल्मों के लगे पोस्टर बड़े ध्यान से देखता था बहुत ही आकर्षक होते थे। उन दिनों फिल्मों के पोस्टर हैण्ड पेंटिड होते थे और उम्दा चित्रकारी के मिसाल थे। शायद यहीं से पोट्रेट के प्रति लगाव पैदा हुआ हो।


जहाँ तक मूर्ति-मंदिर श्रंगार की बात है उसके प्रति लगन गणेश चौथ मेले की झांकी तथा मेले में एक कला संगम लगता था जिसका नाम था 'नन्दन कानन कला भवन' जो बेहतरीन मूर्तिकारी का मिसाल होता था को देखकर ऐसा ही कुछ करना है कि लगन लगी।

इसका अभ्यास हमारे पारिवारिक मंदिर श्री विष्णु लक्ष्मी मंदिर कैथल के हर वर्ष जन्माष्टमी साज-सज्जा करने से हुआ।

हमारा परिवार, हमारा परिवार क्या पूरा चन्दौसी, धार्मिक परम्पराओं और आयोजन से जुड़ाव रखता है और इन आयोजनों में कला, साज- सज्जा श्रंगार की तो महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। चाहे वो शिवरात्रि हो, रामनवमी हो सभी में पौराणिक चित्रकारी या सज्जा की जरूरत रहती है। बस इसी वज़ह से मेरे कला कार्य में धार्मिक चित्रण की बहुतायत है।
हमने सुना है, और फोटो देखें हैं कि आपने भिन्न भिन्न समय पर अमेरिकन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर उन्हें पोट्रेट भेंट किए इसके पीछे का उद्देश्य बतायें।
इन पोट्रेट को बनाने के पीछे प्रमुख उद्देश्य तो यही होता है कि मुझे वह व्यक्तित्व, उसका काम या चरित्र आकर्षित करता है तो उसका पोट्रेट बनाकर प्रेरणा सी मिलती और एक अपनापन और जुड़ाव महसूस होता है।

जैसे कि नब्बे के दशक में माइकल जैक्सन के म्यूजिक का दौर था सभी लोग उनके थिरकने वाले संगीत के दीवाने थे और हम भी उनके प्रशंसको मे थे। तो मन ही मन उनके जैसी प्रसिद्ध पहचान की कल्पना होती थी, एक मित्रवत मुलाकात की तमन्ना होती थी पर कहाँ वह अमेरिकन पाॅप स्टार और इधर हम इंडिया मे, तो इसका सिंपल सा तरीका था पोट्रेट बनाकर अपने स्टूडियो में लगा लिया जाये, बस यहीं इस प्रकार के पोट्रेट बनाने का सिलसिला शुरू हो गया। यह बीस या पच्चीस साल पहले की बात है। जब 1996 में माइकल जैक्सन भारत आया था मुम्बई में शो करने के लिए तब बहुत मन था मिलने का और एक पोट्रेट गिफ्ट करने का पर बात बन सकी।

खैर, उसके बाद सन 2000 की मार्च मे जब बिल क्लिंटन भारत आये तब अपने उत्तरप्रदेश के सहारनपुर के एक कालेज में उनके प्रोग्राम में मिलने का मौका मिला और पोट्रेट भेंट किया। वे बिल गेट्स फाउंडेशन के एक प्रोजेक्ट का उद्दघाटन करने आये थे। एक वैश्विक राष्ट्रपति से मिलने का वह क्षण आज भी ऐसे जान पड़ता है कि मानों कल की ही बात हो।

फिर जब स्व. अटल बिहारी बाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री थे तो 25 दिसम्बर 2003 को उनके जन्मदिन पर एक चित्र एक उपहार स्वरूप प्रस्तुत किया था।

इसके अलावा 2013 में, जब अखिलेश यादव उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री तब उनसे भी मिलने और चित्र भेंट करने का अवसर मिला।
आप आर्डर वाले पोट्रेटस और उसके प्रोसेस यानि कि तकनीक के बारे में कुछ बतायें।
आर्डर पर बनने वाले लगभग सभी पोट्रेट लोग अपने पूर्वज़ की स्मृतियों को बनाये रखने और सम्मान देने स्वरूप में बनवाते हैं यही इन पोट्रेट का मुख्य उद्देश्य होता है। अतः सबसे महत्वपूर्ण और मुश्किल बात इन पोट्रेट को बनाने में यही है कि यह हूबहू कस्टमर की अपेक्षाओ के अनुरूप बनना चाहिए।
दूसरे हमारे पास अधिकतर वो ग्राहक आते हैं जिन के पास अपने पूर्वज का बहुत पुराना और लगभग आखिरी फोटो ही बचा होता है वह भी इस स्थिति में होता है जिसे न तो फोटो के रूप में एनलार्ज किया जा सकता है और न ही आजकल की डिजिटल तकनीक यानि कि फोटोशॉप कर सकते हो और यही एक पोट्रेट कलाकार का सबसे बड़ा चैलेंज है कि इस स्थिति में ग्राहक की स्मृति, कल्पना और विवरण के आधार पर उनके पूर्वज के चित्र को उकेरना।
कई बार तो हमारे कुछ ग्रामीण ग्राहक अंतिम शैय्या का खिंचा फोटो ला पाते हैं और बोलते हैं कि इन्हें कुर्सी पर बैठा बना दिजिए, यह कम्बल हटा के कोट पहना दीजिए आदि आदि डिमांड आती हैं, इस प्रकार हर पोट्रेट हर बार एक नया चैलेंज लेकर आता है। इसकी कोई फिक्स फार्मेट नही हैं।

तीसरे ये पोट्रेट कोई कला प्रेम या मनोरंजन के लिए नहीं बनते है इसलिए इनका स्टाइल फोटो रियलिस्टिक (यानि कि फोटो जैसे ही जीवन्त लगे) होना जरूरी होता है। इस क्वालिटी को मैच करने के लिए ऑयल कलर पेन्टिंग एक सही माध्यम है फिर वो चाहे कैनवास हो या हार्ड बोर्ड और आपको पता ही है यह धैर्य और अभ्यास वाली कला तकनीक है।
इस जानकरी को शेयर करने के लिए धन्यवाद। अपने क्षेत्र में कला के प्रति लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के अपने प्रयासो के बारे में बताइए।
जब भी जैसा भी अवसर मिलता है मैं कला के प्रति जागरूकता बढ़ाने-फैलाने की कोशिश करता हूँ।

गर्मियों की छुट्टियों में कई बच्चे पेंटिग्स सीखने आते हैं इसके अलावा स्कूलों में या जहाँ कहीं भी लोग चित्रकला के बारे में कोई आयोजन होता है और सहयोग- सहभागिता के लिए बुलाते हैं हमेशा तत्पर रहता हूँ।


आपका और आपके परिजनों को कला क्षेत्र से जुड़ाव का क्या प्रभाव रहा?
मुझे कला क्षेत्र से जुड़ने पर स्वरोजगार और एक आत्म संतुष्टि मिली, कई महान हस्तियों से मिलने का मौका मिला। इसके अलावा सबरंग ब्रांड के नाम से मेरे अन्य भाईयों का भी भला हुआ है जो विभिन्न व्यावसायिक प्रयोग के बाद भी स्थापित नही हो पा रहे थे धीरे धीरे कला व साज- सज्जा की सामग्री के व्यापार से जुड़कर बेहतर जीवन स्तर को प्राप्त कर पाये।

इस कला के सफर में चन्दौसी श्रेत्र से कौन कौन लोग आपकी प्रेरणा या सहयोगी रहे?
चन्दौसी के गणेश मेला संस्थापक व डॉक्टर गिरिराज किशोर जी ने हमेशा कलात्मक प्रतिभावान लोगों को बढ़ावा दिया है और हमारी पीढ़ी वे प्रेरणा स्रोत कहे जायेंगे। इसके अलावा मेरे पोट्रेट कला के गुरू स्रोत श्री रामतीर्थ जी का सहयोग जीवन परिर्वतनकारी कहना ठीक होगा। कोई भी आर्टिस्ट अपने से पहले के सभी लोगों के किये गए काम से ही सीखता है और उनके बनाई गई जमीन से आगे का रास्ता तय करता है। बहुत सारे नाम है उनमें विनोद पेण्टर बैनर-बोर्ड के उम्दा आर्टिस्ट, स्व.रामप्रकाश रेलवे साइनबोर्ड आर्टिस्ट, सुरेश जी फिल्मचित्र आर्टिस्ट, कामर्शियल आर्टिस्ट ओम पेण्टर व गोपाल पेण्टर प्रमुख कहे जायेंगे। इसके आलवा समाज के सभी लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग रहा है।
सही, अब आगे आपके क्या प्लान हैं?
प्लान तो बहुत हैं पर सभी प्लान में से एक प्रमुख है आर्ट गैलरी में एग्जिबिशन लगाना और यह लम्बा व महंगा प्रोसेस है देखते हैं कि कब हो पाता है।





Comments