सोन पापड़ी
- vision5design

- May 29, 2022
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Updated: May 30, 2022
शहर के जमीदार श्री विशंभर दयाल की प्रतिष्ठा उनके धन से अधिक, उनके अच्छे कर्मों एवं उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्य के कारणवश बहुत अधिक थी।
विशंभर के दादाजी ने शहर में पहला विद्यालय शुरू किया था जिससे कि शहर के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। उनके जीवनकाल में तो विद्यालय में केवल पांचवी कक्षा तक के बच्चे ही पढ़ा करते थे। विशंभर के पिता ने विद्यालय में आठवीं तक की बच्चों के पढ़ने का प्रबंध कर दिया था।
परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए, विशंभर ने इंटर यानि बारहवीं तक के बच्चों के लिए अपनी पैतृक संपत्ति पर विद्यालय की न केवल इमारत ही खड़ी की बल्कि बच्चों के खेलने की लिए क्रीड़ा स्थल भी बनवाया।
विशंभर की देख-रेख में प्रधानाचार्य महोदय लखनऊ, इलाहाबाद तथा बनारस से विशेष अध्यापकों को आमंत्रित किया करते थे।
विद्यार्थियों की फीस से जो धन इकट्ठा होता था उसे विद्यालय के नियमित खर्चों के लिए प्रयोग किया जाता था तथा विशंभर, अपने पूर्वजों की तरह, विद्यालय के रख-रखाव पर धन स्वयं खर्च किया करते थे। परिवार की यही परंपरा रही कि "विद्यालय व्यापार का जरिया नहीं है। अगली पीढ़ियों को विकसित करने का खर्च हम उठाएंगे परन्तु विद्यालय जैसी संस्था से इसके लिए एक पैसा भी नहीं लेंगे।"
यह परिवार शहर के लगभग एक तिहाई हिस्से का मालिक था तथा पैतृक संपत्ति से ही काफी किराया इकट्ठा हो जाता था, पास के अकबरपुर गांव के खेतों में जो फसल उगाई जाती थी उसे बेचकर थी धन मिलता था।
प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के दिन, विद्यालय में एक भव्य जलसे का आयोजन किया जाता था। इस शुभ अवसर पर, अपने पूर्वजों की तरह, विशंभर अपने परिवार की सदस्यों के साथ खूब सजी हुई बग्घी (घोड़ा गाड़ी) में, विद्यालय जाया करते थे। विशंभर, विद्यार्थियों के अतिरिक्त, विद्यालय में कार्यरत सभी सदस्यों, जैसे प्रधानाचार्य, शिक्षकगण तथा अन्य कर्मचारियों से मिला करते थे। सरस्वती वंदना, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं पुरस्कार वितरण के बाद, स्वयं सभी को मिठाई बांटा करते थे। इस आखिरी गतिविधि की, सभी विद्यार्थी, बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे क्योंकि यह मिठाई साधारण मिठाई न होकर मंगल सेन तथा कल्लू हलवाई की शुद्ध देसी घी की बनी, सोन पापड़ी होती थी जो कि चंदौसी शहर के ताज में लगे अनमोल रतन की समान थी।
मुरादाबाद, बरेली तथा दिल्ली जैसे शहरों से भी लोग चंदौसी की इन दुकानों की बनी सोन पपड़ी के अनेक डिब्बे खरीदते और अपने शहरों में लाकर परिवार के सदस्यों को बांटते थे। विद्यार्थियों के लिए आज के दिन, मिठाई का विशेष महत्व रहता था क्योंकि उन्हें इस मिठाई का एक किलो का पूरा डिब्बा मिलता था, जो समारोह के बाद, विशंभर स्वयं हर उपस्थित व्यक्ति को अपने हाथों से दिया करते थे। कौन सा विद्यार्थी इस स्वर्णिम अवसर को हाथ से जाने देगा जबकि इतनी स्वादिष्ट मिठाई का स्वाद कई सप्ताह न सही कई दिनों तक तो आता ही रहता है?
इस वर्ष विशंभर दयाल के मन में विद्यार्थियों के साथ एक मजाक करने का विचार आया। उन्होंने अपने कर्मचारियों को हिदायत दी कि सोन पापड़ी के डिब्बे गाड़ी से नीचे न उतारे जाएं।
हर वर्ष की तरह कार्यक्रम के शुभारंभ के साथ, भक्ति संगीत तथा पुरस्कार वितरण हुआ। इसी समय कुछ विद्यार्थियों ने भांप लिया,उनका ध्यान गया कि सोन पापड़ी के डिब्बे नहीं दिख रहे लेकिन कुछ अन्य साथियों ने आश्वासन दिलाया कि डिब्बे आते ही होंगे। इतने वर्षों से चली आ रही परंपरा, अचानक कैसे तोड़ी जा सकती है? जैसे ही आखिरी पुरस्कार दिया गया विद्यार्थियों की निराशा कानाफूसी में बदल गई। धीरे- धीरे आवाज आई 'अरे सोन पापड़ी कहां है?' 'अभी तक डिब्बे क्यों नहीं आए?' 'क्या हुआ?'
फुसफुसाहट साफ़ सुनाई देने लगी। विशंभर, उनके परिवार के सदस्य एवं सहयोगी इस सब के प्रत्यक्षदर्शी थे। सभी स्थिति का मजा ले रहे थे। कुछ आशावादी विद्यार्थी अभी भी सोच रहे थे कि आज के दिन सोनपापड़ी का अवतार कहीं से तो प्रकट हो ही जाएगा।
धीरे-धीरे कार्यक्रम के समापन के साथ विशंभर दयाल तथा उनके साथ के गणमान्य सदस्य मंच से नीचे उतरने लगे। विद्यार्थियों के चेहरों का तुषारापात (पतझड़) यानि निराशा साफ़ नजर आ रहा था। फिर भी किसी विद्यार्थी ने इतनी हिम्मत न जुटा पाई कि प्रतिष्ठित विशंभर दयाल जी तक पहुंच कर यह पूछ सके कि इस वर्ष सोन पापड़ी क्यों नहीं बांटी गई।
उनकी गरिमा इतनी अधिक थी कि बड़े-बड़े नेता और अफसर भी उनसे बात करने के लिए विशिष्ट शब्दों का चयन बड़े ध्यान पूर्वक किया करते थे, तो फिर इंटर स्कूल के 12वीं के छात्रों की क्या बात की जाए?
ज़मीदार साहब ने बग्घी पर चढ़ने से पहले विद्यार्थियों को आखिरी अवसर दिया। वे सब की ओर मुड़े और बोले मुझे आशा है आप सब खुश होंगे तथा विद्यालय से संतुष्ट होंगे। हमें बताइएगा यदि आप सबके लिए हम कुछ और कर सकते हों। सभी विद्यार्थियों ने सहमति में सिर हिलाया तथा निराशायुक्त "जी सर" का स्वर सुनाई दिया। विशंभर जाने ही वाले थे कि एक सीनियर विद्यार्थी ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ ऊंचा उठाया।
विशंभर उसे देख कर बोले "हां कहो।"
हाथ जोड़कर गौरव नामक विद्यार्थी ने कहा, सर हमें सभी सुविधाएं देने के लिए हार्दिक आभार, हम सब आपके ऋणी रहेंगे लेकिन सर आपको नहीं लगता कि इस बार बसंत पंचमी कुछ सूखी रही। वहां पर मानो सुई पटक सन्नाटा छा गया।

विद्यार्थियों ने सोचा, यह तो बस गया, ऐसे कैसे ये सब कुछ कह सकता है? कोई विद्यार्थी ऐसे कैसे सोच सकता है?
कुछ भी हो, विशंभर दयाल के मुक्त हास्य ने सन्नाटा खुशनुमा वातावरण में बदल दिया। उन्होंने कहा मैं देखना चाहता था कि तुम सब में से बड़बोला कौन है? शाबाश, कहते हुए, उन्होंने गौरव की पीठ थपथपाई और उसका नाम पूछा। बस सभी उत्साहित छात्रों में सोनपापड़ी के डिब्बों का वितरण शुरू हो गया।
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लगभग दो दशक बाद 1965 में गौरव भारतीय विशिष्ट मंडल का सदस्य बनकर ऑस्ट्रेलिया में 25 अन्य देशों की अंतर्राष्ट्रीय कांनफ्रेंस में भाग लेने गया। 40 वर्ष की आयु में गौरव इस ग्रुप का सबसे कम उम्र का सदस्य "टीम का बेबी" कहलाता था।
ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दौरान जब ऑस्ट्रेलियाई मेज़बान ग्रुप में प्रश्न काल का आरंभ किया तो गौरव सबसे पहला सदस्य था जिसने हाथ खड़ा करके प्रश्न पूछा - "मैम अमरीकन तथा ब्रिटिश मंडल के सदस्यों को दस डालर प्रतिदिन का भत्ता यानि अलाउंस दिया जाता है, जबकि हम भारतीय टीम के सदस्यों को केवल $7 प्रतिदिन ही मिलते हैं। क्या यह संभव है कि हम सबको भी उनके बराबर भत्ता दिया जा सके? कोऑर्डिनेटर ने मुस्कुराकर इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। आज भी गौरव इस नीति का अनुमोदन अर्थात पालन करता है- पहल करो, पूछो तथा जान लो तुम्हें अधिकार ज़रूर मिलेगा।
"महफ़िल में भरा पैमाना बड़ के उठाया जाता है,
अपना टाइम आता नहीं, लाया जाता है।
वो और होंगे जो करते हैं समय का इंतजार,
हमारे लिए वक़्त को वक़्त से पहले बुलाया जाता है। अपना टाइम आता नहीं, लाया जाता है।"
- शंकर सहाय
यह कहानी, शंकर सहाय एवं प्रीती सहाय द्वारा अंग्रेजी पुस्तक Chandausi Junction से ली गई है।
(अध्याय- दो सोन पापड़ी चंदौसी 1944)
इसका हिन्दी अनुवाद श्रीमती मीरा प्रधान ने किया है।
मीरा जी का परिचय:

चन्दौसी के एक सुसंस्कृत, सभ्य एवं सुशिक्षित परिवार में जन्मी, मीरा, परिवार के सभी सदस्यों का स्नेह पाकर दिल्ली में पली-बढ़ी। जीवन मूल्यों को ग्रहण करते हुए, विद्यालय तथा परिवार से शिक्षा पाकर, इंद्रप्रस्थ कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में पांच वर्ष अध्ययन किया। विवाह पश्चात दोनों परिवारों के असीम सहयोग से, शिक्षा के क्षेत्र में, पुनः औपचारिक रूप से प्रवेश करके, बी.एड.की डिग्री प्राप्त कर सरदार पटेल विद्यालय में प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 27 वर्षों के कार्यकाल में, मीरा, छोटे बच्चों में, विभिन्न गतिविधियों द्वारा, हिंदी भाषा के प्रति प्यार जगाने में, समर्थ रही हैं। बच्चों की रचनात्मकता एवं कल्पना शक्ति को बढ़ाकर, उन्होंने संगीत एवं कविता पाठ से, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नया रंग एवं जोश लाने का सफल प्रयास किया है। व्यायाम और खेल को, पढ़ाई के साथ-साथ प्राथमिकता देते हुए, सदा स्वस्थ शरीर में, स्वस्थ विचारों को पनपने देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरणा दी है।





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