चन्दौसी के रचनात्मक व्यक्तित्व: मनोज वशिष्ठ से मुलाकात
- vision5design

- Oct 8, 2021
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जागरण मीडिया समूह में मनोरंजन डेस्क के डिप्टी एडिटर मनोज वशिष्ठ से चन्दौसी और चन्दौसी की यादों के बारे में एक ख़ास इन्टरव्यू।

क्या चन्दौसी अब भी आपकी स्मृतियों में बसता है??
भूलने का तो सवाल ही नहीं उठता। अभी वक़्त ही कितना हुआ है चंदौसी छोड़े हुए, लगभग 20 साल। जिस शहर में आपका जन्म हुआ हो, जिन गली-मोहल्लों में बचपन बीता हो, जिन सड़कों-बाज़ारों को पैरों से नापा हो, जहां उम्रभर के दोस्त मिले, जहां आपने सपने देखें हों, पैरों पर खड़े होने की जद्दोज़हद की हो... वो शहर दिल से कैसे निकल सकता है! उन बेशकीमती यादों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। आख़िरी सांस तक आपके साथ रहती हैं। हां, काम में व्यस्तता और पारिवारिक ज़िम्मेदारियां बढ़ने के साथ वो प्राथमिकताओं की सूची में नीचे चली जाती हैं, मगर मिटती तो नहीं। कभी कोई, कहीं कुरेद देता है तो फिर से वहीं ले जाती हैं, जहां से चले थे और मुझे तो लगता है, उम्र बढ़ने के साथ वो यादें ज़्यादा कचोटती हैं। मैं चंदौसी से निकलकर मुरादाबाद, दिल्ली और मुंबई रहा... चंदौसी दिल से कभी नहीं निकला।
जागरण मीडिया समूह से जुड़े हुए आपको कितना समय हो गया है? आपके इस सफर की शुरुआत कब और कैसे हुई?? और वर्तमान में आपकी इस मीडिया समूह मे क्या जिम्मेदारिया हैं???
जागरण मीडिया समूह में मेरी यह दूसरी पारी है, जो 2016 से जागरण वेबसाइट के साथ चल रही है।

मैं यहां डिप्टी एडिटर के पद पर तैनात हूं और मनोरंजन डेस्क से जुड़ा हूं।

अब अगर पहली पारी की बात करें तो पत्रकारिता में मेरे करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से ही हुई। मुरादाबाद में लगभग 4 साल अख़बार के लिए काम किया। फिजिक्स में एम.एमसी करने के बाद अचानक पत्रकारिता में जाने की एक अलग और जज़्बाती कहानी है, वो फिर कभी। दैनिक जागरण में ट्रेनी रिपोर्टर की भर्ती निकली थी। मैं काम ढूंढ रहा था। भाषा पर पकड़ अच्छी थी। अख़बारों में मेरे 'सम्पादक के नाम पत्र' छपते रहे थे, जिसकी वजह से इस पेशे से वैचारिक तौर पर एक कनेक्शन बना हुआ था। हिम्मत करके टेस्ट दिया, जिसमें भाषा और पेशे से संबंधी कुछ सवाल थे। टेस्ट पास करने के बाद इंटरव्यू हुआ और किस दिन आना है, बता दिया गया। दैनिक जागरण के चार साल मेरे लिए पत्रकारिता की पाठशाला रहे। सभी वरिष्ठ साथियों से कुछ ना कुछ सीखा। यहां कुछ बेहतरीन दोस्त मिले, जिनसे जीवनभर का नाता जुड़ा। संघर्ष के बावजूद मुरादाबाद की बहुत अच्छी यादें ज़हन में बसी हैं।
बढ़िया! अब यह बतायें , जीवन के इस पडाव पर आप कैसा महसूस करते हैं?
देखिए, यह बड़ा मनोवैज्ञानिक सवाल है दोस्त। कभी पीछे मुड़कर देखता हूं तो संतोष मिलता है। पेशेवर जीवन में जो हासिल किया है, पूरी विनम्रता के साथ उसे उपलब्धि मानता हूं, क्योंकि जब शुरू किया था तो पता नहीं था कितनी दूर तक जा पाऊंगा।

भविष्य के लिए योजनाएं बनाने का समय तो बिल्कुल नहीं था मेरे पास, बस पहला क़दम बढ़ाना था। बढ़ा दिया। वर्तमान में रहते हुए ख़ुद को साबित करने की ललक ने ठहरने नहीं दिया। इस सफ़र में कई लोग ऐसे मिले, जिनकी संगत ने प्रेरणा दी। उन सभी का दिल से आभार। सीखने की प्रवृत्ति बने रहना ज़रूरी है, ताकि आपकी प्रासंगिकता बनी रहे। प्रिंट के बाद ब्रॉडकास्ट और अब डिजिटल मीडिया। सीखने की प्रक्रिया जारी है। भविष्य की योजनाएं बनाने की आदत अभी भी नहीं है। हां, छोटे-छोटे पड़ाव पार करने की चुनौती आनंद देती है और बढ़ते रहने की प्रेरणा भी।
अपने आरम्भिक शिक्षा और बाल्यकाल के बारें में बतायें और उस बचपन के उनुभव में चन्दौसी का क्या योगदान रहा या चन्दौसी ने आपके ऊपर क्या छाप छोड़ी?
आरम्भिक शिक्षा सरकारी प्राइमरी स्कूल में हुई। पं. मदन मोहन मालवीय प्राइमरी स्कूल, इसके बाद बेसिक शिक्षा नानक चंद आदर्श इंटर कॉलेज में...। बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में उसके पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण की भूमिका सबसे अहम होती है। अगर इन सब फैक्टरों को मिलाकर बोलूं तो मुझे अपने बचपन पर गर्व है। बचपन के गिले-शिकवे वक़्त से साथ खट्टी-मीठी यादों में बदल जाते हैं। मैं इस मामले में ख़ुशकिस्मत हूं कि मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने मुझे भटकने नहीं दिया। मैं बहुत सामाजिक प्राणी नहीं रहा हूं। आज भी नहीं हूं। मेरे आस-पास जो समाज रहा, उसमें तमाम रंग थे और वो सब जगह होता है, बस आप पर कौन-सा रंग चढ़ रहा है, वो ज़रूरी है और आपकी शख़्सियत का सबसे अहम पहलू है।

परिवार से बाहर मेरा समाज मेरे कुछ दोस्त रहे। एक बार फिर इसे मैं अपनी ख़ुशनसीबी मानता हूं कि जो दोस्त मिले, उन्होंने बहकने नहीं दिया। रचनाशीलता के लिए स्वस्थ सांस्कृतिक वातावरण होना बहुत ज़रूरी है। इस मामले में चंदौसी जैसे व्यापार-प्रधान क़स्बे थोड़ा पिछड़े रहते हैं और यही वजह है कि जब आप चंदौसी से निकलकर देश-दुनिया के अलग-अलग शहरों में 20-25 साल गुज़ार लेते हैं तो आपको रामबाग की रामलीला और मेला गणेश चौथ की यादें कचोटती है। चंदौसी में रचनाशीलता की कमी कभी नहीं रही, मगर वो बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक पहचान नहीं बन सकी। इस मामले में आपके और मेरे अनुभव अलग नहीं होंगे। ये सब मैंने इसलिए कहा, क्योंकि आपने चंदौसी की छाप की बात की।
नये चन्दौसी और बचपन के चन्दौसी में आपको प्रमुखत: क्या फर्क नजर आता है?
चंदौसी अब आना-जाना अधिक नहीं होता, मगर सच बताऊं तो मुझे बहुत फर्क दिखता नहीं। हां, भौगोलिक तौर पर कहूं तो बाज़ार बदल गये हैं। एक पूरी पीढ़ी नये रंग-ढंग के साथ नज़र आती है। रास्तों पर निकलता हूं तो जाने-पहचाने कम अजनबी लोग ज़्यादा मिलते हैं। शहर अब ज़्यादा फैला हुआ नज़र आता है। मगर, मेरा बचपन जिन गलियों में बीता, वहां मुझे आज भी वही चंदौसी दिखती है, जिससे मेरा भावनात्मक जुड़ाव है।
क्या कोई ऐसी चीज है जो आप वर्तमान चन्दौसी में वह मिस करते हों?
मैं सबसे अधिक क्या मिस करता हूं? दोस्तों के साथ बिताया हुआ वक़्त। चंदौसी के लिए मेरी यादों का वो सबसे ज़रूरी हिस्सा है।

एक बार फिर उन गलियों और रास्तों पर दोस्तों संग बिना कोई बोझ लिए घूमना चाहता हूं।
चन्दौसी की पंसदीदा खाने-पीने की चीज और जगह बतायें।
- फव्वारा चौक पर गोलगप्पे
- ब्रह्म बाज़ार में छोले, खस्ता-सब्जी
और
- रेलवे स्टेशन के छोले-भटूरे। :)
चन्दौसी में आपकी पसंदीदा स्कूल-कालेज या खेल-कूद की जगह।
एसएम इंटर कॉलेज में 'पाकिस्तान' की तरफ़ बंद कुएं पर बना वो चबूतरा, जहां शाम को अड्डेबाज़ी और हमारे इंटेलेक्चुअल डिस्कशन होते थे। :)
चन्दौसी के पंसदीदा मेले व त्यौहार।
- बगिया वाली का मेला- बचपन में सुबह-सुबह मम्मी के साथ जाना। पता नहीं, एक अलग ही एहसास था, शब्दों में ज़ाहिर करना मुश्किल है।
फिर थोड़ा बड़ा होने पर गणेश चौथ का मेला।
होली, दशहरा, दिवाली।
बहुत प्यारी यादें हैं।
चन्दौसी के पंसदीदा व्यक्तित्व व शिक्षकगण।
प्राइमरी में सोहनलाल सर, दसवीं में नंदकिशोर गुप्ता सर, इंटरमीडिएट में जेसी शर्मा सर, विद्यासागर सर, मेहरोत्रा सर।
टॉप थ्री
आपकी तीन पसंदीदा हिन्दी किताबें कौन सी हैं?
1- मुर्दों का टीला- रांगेय राघव
2- नरेंद्र कोहली की रामकथा सीरीज़
3- गीता

आपकी टॉप थ्री इंग्लिश बुक्स कौन सी कही जा सकती हैं?
1- Without Fear- The Life & Trial Of Bhagat Singh by Kuldeep Naiyyar,
2- Shiva Trilogy By Amish Tripathi,
3- The 7 Habits of Highly Effective
People

आपकी तीन पसंदीदा हिन्दी फिल्में कौन सी हैं?
1- गोलमाल (अमोल पालेकर)
2- चुपके-चुपके
3- जाने भी दो यारों

आपकी टॉप थ्री इंग्लिश फिल्म कौन सी कही जा सकती हैं?
1- सिनेमा पैराडाइज़ो
2- लॉर्ड ऑफ द रिंग्स सीरीज़
3- गॉडफादर सीरीज़

आपको जिन्दगी में सबसे ज्यादा प्रेरित करने वाले एक व्यक्तित्व का नाम बताइए।

सरदार भगत सिंह
...और अंत में यह खाली पेराग्राफ आप अपनी मर्जी से जो भी कहना चाहें लिखें।
आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बधाई और शुभकामनाएं इस शुरुआत के लिए और यादों में गोते लगाने का मौक़ा देने के लिए।





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