बेवर के वैद्य श्री राजेंद्र शर्मा जी की पुस्तिका: पारदेश्वर
- vision5design

- Aug 25, 2022
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इस वर्ष की सर्दियों के मौसम में मेरा बेवर जाना हुआ। कई घरेलू कार्य निपटाने के बाद मेरे छोटे भाई जीतेन्द्र प्रताप सिंह ने वैद्य श्री राजेंद्र शर्मा जी से उनके निवास स्थान व क्लिनिक जो कि जी. टी. रोड, बेवर में शिखा आयुर्वेदिक स्टोर के पास स्थित है से परिचय करवाया।
उनके अपनत्व व व्यवहार से मैं बहुत प्रभावित हुआ।
कई विषयों पर चर्चा हुई। उनमें से एक था पारद यानि कि मर्करी शोधन व उसके उपयोग।

बात ही बातों में उन्होंने मुझे बताया कि वे अपने इस पारद ज्ञान को सामाजिक और मानविक हित में लोगों तक पहुंचना चाहते हैं।

उन्होंने मुझे कुछ किताबें दी ताकि मैं उन्हें पढ़कर आयुर्वेद, अध्यात्म व मानव जीवन के बीच जो अटूट संबंध है उसे समझने का प्रयास करूँ।

इन दी गई किताबों में से एक ख़ास पुस्तिका है जिसका शीर्षक " पारदेश्वर" है। यह पुस्तिका वैद्य जी द्वारा लिखित है और सार में पारद ज्ञान के बारे में बताती है।
आप इसे मर्करी का आयुर्वेद व अध्यात्म में प्रयोग की एक कुंजी कह सकते हैं।

मैं इस पुस्तक की प्रस्तावना से उद्दरित कुछ अंश यहाँ देना चाहूंगा।

पुस्तिका की प्रस्तावना से लिए गये शब्द: 👇🏼
संसार में जब से मानव सृष्टि हुई है तभी से मनुष्य दैहिक, दैविक एवं भौतिक व्याधियों का ग्रास रहा है जो पातकों का दण्ड स्वरूप दैवकृत विधान है। जिसके समाधान हेतु आचार्यो ने रसलिंग को प्रतिष्ठित करके उसकी पूजा अर्चना करने का विकल्प बताया है।
इस रसलिंग को प्राप्त करने के लिए पारद के सुलभ और सम्भव आठ संस्कार कर लेने के साथ ग्रासमान, अभ्रक जारण और भक्षण कियायें करने के बाद ठोस अवस्था स्वीकार कर लेता है।
"जिसके गुणों को भगवान शिव ने स्वंय देवी पार्वती से कहा है"
अभ्रकस्तव बीजं तु मम बीजं तु पारदः ।
अनयोर्मेलन देवि मृत्युदारिद्रय नाशनम् ।।
-(र.द., नि. र.)
अर्थात:
तुम्हारा बीज अभ्रक और मेरा बीज पारद को बद्ध करके लिंगाकार स्वरूप देकर पूजन करने से मृत्युभय और दारिद्रय मिट जाता है।
रसशास्त्र संशोधकों ने अपने कियात्मक संशोधनों द्वारा
पारद में विभिन्न प्रकार की शक्ति और प्रभावकारी गुणों का अनुभव करके बताया है कि मानव जीवन को आधि-व्याधि से निर्मुक्त रखते हुए वृद्धावस्था रहित बलवान सुदृण तथा अमृत्व प्रदान करने की अचिन्त्य और अद्भुत सामर्थ्य है।
क्योंकि पारद में जिन द्रव्यों का उद्बोधन किया जाता है, उन पदार्थों के संस्कार उसमें नियोजित हो जाते हैं जिससे पारद की अपनी अलौकिक और अन्य शक्ति की उत्कान्ति होती है। जिसका प्रभाव होता है -आनन्द परम् मंगल परम कल्याण जिसे सभी चाहते हैं
अतः शुभ ही शुभ
"श्व: श्रेयसं शिवगढ़।
कल्याणं मंगलं शुभम् ।।"
(अमरकोष)।
यह अलौकिक शक्ति संस्कारों से ही सम्भव हो पाती है।
आत्मा और मन से सम्बन्धित विषयों से मुक्ति पाने के लिए पारद में बन्धन संस्कार आपेक्षित है। जब पारद बद्ध कर लिया जाता है तब उससे वह कार्य होता है जो अनेक जन्मो के प्रयास और अविरल चिन्तन से एक योगी प्राप्त करता है।
जो योगचित्त की वृत्तियों के निरोध पर अभिलम्बित है। जो कदाचित उन वृत्तियों के वैकारिक अवस्था में सिद्धि से विचिलित भी हो सकता है किन्तु पारद शिवलिंग से प्राप्त सिद्ध परिवर्तित नहीं होता ।
पारद शिवलिंग से जो करुणा ज्योति प्रज्वलित होती है। उससे साधक के मन और आत्मा को स्वयं का आभास होने लगता है। जिसका पर्यावसान मोक्ष है।
यथा-
रसबन्धनश्च स: धन्यः ।
प्रारभेस्य सततभिव करुण:।।
सिद्ध रसे करिष्ये।
महीमहं निर्जरामरणम् ।।
साभार: वैद्य राजेंद्र शर्मा जी द्वारा लिखित पारदेश्वर पुस्तिका की प्रस्तावना से
फोटोज़ व शब्द: पुष्पेन्द्र प्रकाश सागर




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